नारी जीवन (एक दृष्टिकोण)

| लेखिका – निवेदिता चक्रवर्ती |

नारी जीवन के बारे में यूँ तो बहुत कुछ लिखा गया है।  हमारा अधिकांशतः साहित्य नारी के ऊपर होने वाले अत्याचारों और नारी -प्रताड़ना से भरा हुआ है।  नारी को ” बेचारी ” का स्टैम्प बहुत स्वच्छंद तरीके से लगाया गया है। मेरा नारी जीवन के बारे में कुछ अलग दृष्टिकोण है ।  क्योंकि मैं नारी हूँ तो इस लिंग के बारे में कुछ कहने का मुझे विशेषाधिकार प्राकृतिक रूप से प्राप्त है। मैं आज जीवन का अर्धशतक पार कर चुकी हूँ।  अपनी दादी ,नानी,माँ ,भाभियों  सभी के जीवन से परिचित हूँ।  स्वयं के जीवन के उतार-चढ़ाव देखे हैं। 

अपने अनुभवों के आधार पर कहती हूँ कि मुझे नारी जीवन के ऊपर “बेचारी ” जैसी व्याख्या पर आपत्ति है।  मुझे आपत्ति है जब नारी-जीवन को मनुष्य जैसे नहीं, बल्कि पुरुष के दर्पण से आँका जाता है और ये स्वयं एक बड़े  प्रतिशत में नारी भी करती है। बहुतेरी नारी स्वयं को मनुष्य जैसा देखती ही नहीं, वह अपने लिंग विशेष के खोल से निकल ही नहीं पाती और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व ,  जीवन की रूप-रेखा,  जीवन के उद्देश्य,  जीवन के लक्ष्य , उसकी सफलता  और असफलता अपने संबंधों में बंधे पुरुष के इर्द-गिर्द बाँध कर रख देती है। यहाँ तक कि स्वयं के जीवन को ही नहीं बल्कि किसी और नारी के जीवन को भी उसके संबंधों में बँधे पुरुष के स्वभाव, आदतों, विशेषताओं से आँकने लगती है। नारी का जीवन एक मनुष्य का जीवन है और प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन के विकास या पतन का जिम्मेदार स्वयं होता है। अपने जीवन की बागडोर स्वयं संभालनी पड़ती है। जीवन के कष्टों से पलायन, स्वयं को लाचार सिद्ध करना या दूसरों पर आरोपों से स्वयं की निष्क्रियता का औचित्य सिद्ध करना एक कर्मयोद्धा की पहचान तो कतई नहीं है।

अपने विकास पर अंकुश लगाने का भी उत्तरदायी पुरुष को ही बनाती आयी है नारी। अपने जीवन की रूप-रेखा की जिम्मेदारी स्वयं को ही उठानी पड़ती है। एक मनुष्य जीवन सदैव दूसरों पर आरोप-प्रत्यारोप से सिद्ध नहीं होता, स्वयं जीने का उपक्रम सजाना होता है, एक ही मनुष्य जीवन है सबका, चाहे वो नारी का ही क्यों न हो। अपने जीवन की सफलता और असफलता दोनों के उत्तरदायी हम स्वयं ही होते हैं, दूसरा कोई नहीं। संघर्ष हर मनुष्य के जीवन में है, संघर्ष लिंग विशेष पर कदापि निर्भर नहीं करता। बहुत से पुरुष मिलेंगे जो अपने जीवन की असफलताओं का श्रेय अपने संस्कारों और अपनी परवरिश को देते होंगे। विपरीत परिस्थितियों से जूझ कर आगे आने का नाम ही जीवन है, वहीं पड़े रहकर आरोप – प्रत्यारोप के बीच जीवन जीना श्रेयस्कर नहीं माना जाएगा। 

एक नारी जो माँ भी है, यदि अपने जीवन से असंतुष्ट है, निराश है, स्वयं को पराजित महसूस करती है, भला बताइये, ऐसी नारी अपने विकसित होते हुए बच्चे में कैसे ऊर्जा का संचार कर रही होगी, अपना कौन-सा उदाहरण प्रस्तुत कर रही होगी। इतिहास साक्षी है कि महाराणा प्रताप को बचपन से साहस, ऊर्जा और वीरता उनके अंदर उनकी माता महारानी जयवंता बाई ने भरी थी, छत्रपति शिवाजी महाराज की माँ राजमाता जीजाबाई ने उनमें देशभक्ति और धर्म के प्रति प्रेम भरा। ऐसी कई नारियों और माँओं के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है जो विपरीत परिस्थितियों में भी आशावान, सकारात्मक और संघर्षशील रहीं और जिन्होंने अपने बच्चों के आगे स्वयं को एक सफल, सकारात्मक और ऊर्जात्मक मानुषी के रूप में सदैव प्रस्तुत किया। एक संघर्षशील माँ ही अपने बच्चों की रीढ़ की हड्डी मजबूत कर पाती है।

नियति के कठोर वक्ष को अपने दृढ़ संकल्पों, मजबूत इरादों और अनवरत कर्म से बेधते रहने का ही नाम जीवन है। ये जीवन हमारा कर्मक्षेत्र भी और युद्धक्षेत्र भी। ये आप पर निर्भर करता है कि आपकी मृत्यु के बाद आपकी संतति, संबंधी और समाज आपको कैसे याद करता है-एक हारा हुआ मनुष्य या एक संघर्षरत प्रगतिशील मनुष्य। एक ही जीवन है, इसका उत्तरदायित्व स्वयं के कंधों पर लेना ही होगा और जो मनुष्य प्रयास करता है, ईश्वर और भाग्य उसके लिए मार्ग बनाते जाते हैं और वह अंततः सफल होता ही है।


24 thoughts on “नारी जीवन (एक दृष्टिकोण)

  1. एक संतुलित व्याख्या, सटीक तर्क और विचारों का सफाई से सामने लाना इस लेख की विशेषता है। पद्य और गद्य में निपुण होना एक वरदान से कम नही,, आगे भी इन्तजार रहेगा आपके लेखों, कविताओं का। बदायी हो निवेदीता जी

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    1. बहुत धन्यवाद भूपेन्द्र जी, आपने मेरे लेख को पढ़ा और अपनी टिप्पणी दी, हार्दिक आभार 🙏🏻

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  2. माँ, आप मेरी प्रेरणा हो ! नारी के संघर्ष , नारी का आत्मा विश्वास और नारी की सफलता सभी आपके जीवन में देखा है मैंने!!

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    1. Shiuli Chakravorty ❤️ तुम मुझसे बेहतर मनुष्य बन पाईं, इसकी प्रसन्नता है मुझे और ईश्‍वर की कृतज्ञ भी हूँ 🙏🏻

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    2. निवेदिता जी,
      नारी से समबन्धित लेख पढ़ा ।बहुत अच्छा लगा ।नारी का स्वरूप थोड़ा बदला है, पढ़ लिख गई है, आज वो.सक्षम भी है ।
      लेकिन आपकी ही तरह मेरा भी मानना है,.कि ईश्वर र्प्रदत्त सभी गुणों को अपने अन्दर उजागर कर ही वो समाज को भी सही राह दिखा सकती है ,स्वयं में भी पूर्ण तरह से स्वाभिमान. की अधिकारी भी बन सकती है । आज उसे जिन घिनौने समझौते से दो चार.होना पड़ता है,स्वत: समाज से अदृश्य होतीं जायेगी ।

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  3. “ विपरीत परिस्थितियों से जूझ कर आगे आने का नाम ही जीवन है, वहीं पड़े रहकर आरोप – प्रत्यारोप के बीच जीवन जीना श्रेयस्कर नहीं माना जाएगा। ”

    मेरे लिए ये article का भी सार है, और जीवन का भी।। ये article सीख भी दे रहा है और प्रेरणा भी। बहुत आभार आपका । 🙏🏻

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    1. Gurbakhshish बहुत धन्यवाद, अनुभव लेखनी को एक अलग तेज प्रदान करते हैं 🙏🏻

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  4. बहुत सही चित्रण करा है आपने नारी और उसकर जीवन का। सच में हमारा इतिहास भरा हुआ है महँ नारियों से जिन्होंने कई वीरों को प्रोत्साहित कर व् उनका जीवन श्रेष्ठ बनाया।
    बिलकुल ये हमपर निर्वहार करता है कि हम अपने जीवन को क्या दिशा देने चाहते है।

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  5. मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना है – “क्या लड़कियों की तरह रो रहा है/ शर्मा रहा है”…. क्यों.. क्या अपनी भावनाओं को ज़ाहिर करना कोई गुनाह है…?
    नहीं.. बिल्कुल भी नहीं….
    नारी का हृदय जितना कोमल है.. उसकी शख़्सियत उतनी ही मज़बूत है…. आपने बहुत सुंदर शब्दों में नारी का चित्रण किया है और यह बतलाया है कि नारी केवल एक जीव मात्र नहीं.. नारी संपूर्ण सृष्टि का नाम है….🙏🌹🌹

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  6. बहुत सही समझाया अपने मैं इस दुनिया मे ज़्यादा अपनी माँ से प्यार करता हूँ, और मेरी कोई सगी बहन न होने के कारण अपनी अम्मी के साहस को देखकर किस तरह से वो सारा काम करती है, फिर भी उफ़ तक नहीं करती उन्हीं की तरह हर औरत है मैं यही मानता हूँ

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  7. बहुत अच्छा लिखा आपने ।
    मैंने भी लिखना शुरू किया है ।आप मेरे ब्लॉग पर विजिट करें ।अपनी राय दें । पसन्द आए तो फॉलो करें 🙏

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